विकलांग विधवा बहु की शादी।

विकलांग विधवा बहु की शादी

Viklang Vidhwa Bahu Ki Shadi Moral Story In Hindi, Top 10 Moral Short Stories In Hindi, Pratilipi Kahaniyan Hindi Love Story Writing, Akbar Birbal Jaadui Chakki Bhutiya Munshi Premchand Chudail Pariyon Panchtantra Ki Kahaniyan Horror Stories, Bhoot Wali Akbar Birbal Ki Hindi Kahani, Short Story In Hindi Faily Tales

विकलांग विधवा बहु की शादी - Moral Story In Hindi

Story In Hindi – कौशल्या और रघुवीर की एक बेटी थी सविता। सविता को बचपन में ही पोलियो मार गया था जिससे वह एक पैर से अपाहिज थी। सब लोग उसे दया के दृष्टि से देखते थे और अपने माँ-बाप की बहुत लाड़ली थी उसकी आँखों में कभी आंसू नहीं आने देते थे।

सविता अपाहिज जरूर थी लेकिन सभी कामो में कुशल थी स्कूल में भी वह सभी अध्यापको की प्रिय थी एक दिन कौशल्या बोली।

कौशल्या – सुनो जी सविता की ग्यारहवीं पास हो गयी है हमारी बेटी दिव्यांग है उसके लिए भी ऐसा ही लड़का ढूढ़ना पड़ेगा। लगता है उसकी शादी करने में बहुत मुश्किलें आएँगी इसलिए अभी से लड़का ढूढ़ना सुरु कर दो।

रघुवीर – हां कौशल्या सही कहती हो, सविता कितनी सुन्दर और सर्वगुण सव्पन्न है लेकिन पैर की वजह से मेरी बेटी की जिंदगी ख़राब हो गयी।

सविता ने अपने माँ और बाबू जी की बात सुन ली वह पास आकर बोली।

सविता – बाबू जी क्या मैं आप सब पर बोझ हूँ मेरा पैर खराब है इसका मतलब यह तो नहीं मैं किसी पर आश्रित रहूंगी फिर कैसे हुयी मेरी जिंदगी ख़राब।

कौशल्या – मन छोटा मत कर बेटी किसने कहा की तू बोझ है तू तो हमारी आँखों का तारा है।

सविता – माँ मैं पढाई के साथ-साथ कुछ करना भी चाहता हूँ जिससे मैं खुद पर निर्भर रह सकू।

इधर सविता की पढ़ाई पूरी हो गयी और उधर रघुवीर सविता के लिए लड़का ढूढ़ने लगा। सविता के लिए परेश का रिस्ता आया, परेश रसायन फैक्ट्री में काम करता था। परेश अपनी माँ (रमा) और अपने पिता जी (मुकेश) के साथ सविता को देखने उसके घर आया।

मुकेश – अरे बेटा लड़की का तो पैर खराब है।

परेश – पिता जी अगर मैं दिव्यांग लड़की से शादी करूँगा तो मुझे किसी का जीवन सँभालने का सौभाग्य मिलेगा।

रमा – बेटा तेरी जिंदगी है जो भी फैसला हो सोच संभाल कर लेना।

परेश – देखिये सविता जी मैंने आपकी जितनी तारीफ सुनी मैं खुद को आपसे मिलने से रोक ही नहीं पाया, क्या आप शादी के लिए राज़ी है।

सविता – परेश जी मैं एक अपाहिज लड़की हूँ और आप पूर्ण रूप से स्वस्थ है क्या आप एक अपाहिज लड़की को स्वीकार करेंगे।

परेश – सविता मैं जिंदगी भर आपका सहारा बनने के लिए तैयार हूँ अगर आपको ऐतराज ना हो तो।

सविता – अगर आप तैयार है तो मैं खुशनसीब हूँ की मुझे आप जैसा जीवन साथी मिलेगा।

सविता और परेश की बहुत धूम धाम से शादी हुयी। चारो तरफ चर्चा थी की बड़ी भाग्यसाली है सविता जो दिव्यांग होते हुए भी उसे इतना अच्छा पति मिला है।

रमा – बहु आज तुम्हारा पहला दिन है इतनी जल्दी कैसे उठ गयी आराम से उठ जाती।

सविता – माँ मुझे जल्दी उठने की आदत है मैंने नास्ता बना दिया है आप सब लोग नास्ता कर लीजिये।

रमा हैरान थी की एक पैर खराब होते हुए भी सुबह उठकर नास्ता भी बना दिया। इसी तरह सविता ने थोड़े ही दिनों में सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। सविता से सभी बहुत खुश थे।

रमा – परेश तेरी बीबी लाखो में नहीं करोडो में एक है मैं तो डरती थी की कही ऐसा ना हो की एक दिव्यांग लड़की से शादी करके कही मेरे बेटे की जिंदगी ख़राब ना हो जाये।

परेश – माँ मेरा फैसला कभी गलत नहीं हो सकता। आपसे एक बात कह रहा हूँ की अगर मुझे कुछ हो जाये तो सविता को अपनी बेटी की तरह रखना।

रमा – चल पागल ऐसे नहीं बोलते वो अभी भी मेरी बेटी ही है।

और अगले ही दिन उनकी खुशियों को जैसे किसी की नज़र लग गयी परेश की फैक्ट्री में जहरीली गैस लीक हो जाने से कई लोगो की मौत हो गयी जिनमे परेश भी शामिल था।

जब ये खबर परेश के घर पहुंची तब घर में हाहाकार मच गया लेकिन सविता तो जैसे पत्थर सी हो गयी वह खामोश थी उसकी आँखों में आशु नहीं थे वह परेश को यू ही फटी आँखों से देखती रही। कुछ औरतो ने उसे हिलाते हुए कहा “बहु रो ले देख परेश को वह मर गया है अगर रोयेगी नहीं तो पागल हो जाएगी तू विधवा हो गयी है विधवा”

इस तरह की बातें सोच कर सविता फुट-फुट कर रोने लगी सविता रोते हुए बोली “उठो परेश आँखे खोलो मैं अकेले किसके सहारे जियूँगी अभी तो मैंने तुम्हारे साथ कुछ ही दिन गुजारे थे फिर मुझे अकेला छोड़कर क्यों चले गए”

परेश का अंतिम संस्कार हो गया और सविता के अरमानो का भी।

रमा – अरे ये क्या बहु सफ़ेद साड़ी क्यों पहनी तुमने।

सविता – माँ सबने मुझे कहा की मेरे जीवन के सब रंग परेश के साथ ही चले गए अब मुझे सफ़ेद साड़ी ही पहननी है।

रमा – नहीं बेटी, तुम हमारे दुःख को और मत बढ़ाओ आज से तुम कभी भी सफ़ेद कपडे नहीं पहनोगी।

हप्ते महीने यू ही सोक में गुजर गए। कौशल्या और रघुवीर सविता को लेने के लिए आये।

कौशल्या – मेरी बेटी का जीवन तबाह हो गया पूरी जिंदगी अकेले कैसे काटेगी इसलिए हम उसे अपने साथ ले जाना चाहते है।

रमा – देखिये समधन जी सविता कही नहीं जाएगी आप उसकी शादी करके कर्तव्य मुक्त हो चुके है लेकिन अब हमारे भी कुछ कर्तव्य है हमारी बहु हमारी बेटी बनकर हमारे पास ही रहेगी।

ये कहते हुए रमा ने सविता को गले से लगा लिया।

मुकेश – हां समधी जी रमा सही कह रही है हम सविता को आगे पढ़ाएंगे और किसी लायक बनायेगे आप चिंता मत करना हम अपनी सविता को पलकों पर बिठाकर रखेंगे।

सविता – माँ बाबूजी परेश इनके इकलौते बेटे थे अब वो नहीं है तो ऐसे में मैं भी इनको छोड़कर चला जाऊ ये सही नहीं है मैं इनके पास रहकर ही इनकी सेवा करुँगी।

सविता के माँ बाबूजी चले जाते है अब सविता अकेली थी उसने अपना सारा ध्यान पढ़ाई में लगा दिया। ऐसे में उसकी मुलाकात गौरव से हुयी जो समय-समय पर सविता की पढ़ाई में मदद करता था।

गौरव मुकेश के दोस्त का सबसे अच्छा बेटा था उसका काम के सिलसिले में परेश के पिता के पास आना-जाना लगा रहता था गौरव इंजिनियर था और बड़ा ही सलीन स्वभाव का संस्कारी लड़का था।

चारो तरफ औरते बातें बनाने लगी एक औरत बोली “अरे देखो कैसी विधवा है ये सफ़ेद साड़ी नहीं पहनती पति का जरा भी दुःख नहीं है” तो दूसरी बोली “बन सवर कर कॉलेज जाती है बेचारे रमा और मुकेश का तो बुढ़ापा ही खराब है” तीसरी औरत ने कहा “पहले इस लड़के का घर में आना जाना ठीक था लेकिन अब परेश नहीं है तो इसे जवान विधवा बहु के घर नहीं आना चाहिए”

लेकिन सविता को किसी की बातो से कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योकि उसके सास– ससुर उसके साथ थे। रमा जब इतनी अच्छी बहु के लिए लोगो के ये ताने सुनती तो वह तड़प उठती थी रोने लगती थी सविता ने अपनी मेहनत से बीएड कर ली और विकलांग कोटे में वह एक शिक्षिका के रूप ने नियुक्त हो गयी।

रमा – सुनो परेश के पापा हमारी सविता अब एक टीचर बन गयी है लोग ना जाने उसे कैसे-कैसे ताने देते है हमें अब उसकी शादी कर देनी चाहिए।

मुकेश – सही कह रही हो रमा, विधवा है अनाथ नहीं जो लोगो की उलटी सीधी बातें सुनेगी। हम अपनी बहु की शादी धूम-धाम से करेंगे।

मुकेश ने जब अपनी बहु की रिश्ते की बात जब कुछ लोगो से की तब लोग कहते “अरे मुकेश तू पागल तो नहीं हो गया विधवा बहु की शादी करना चाहता है तू ”

मुकेश – हां मैं उसकी शादी करना चाहता हूँ उसकी जिंदगी से विधवा शब्द हमेशा के लिए मिटाना चाहता हूँ।

तभी गौरव ने आ करके कहा

गौरव – अंकल अगर आप सविता के काबिल समझे तो मैं आपके बहु से शादी करने के लिए तैयार हूँ।

मुकेश – गौरव तुम।

गौरव – हां मैं।

मुकेश – मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है की मेरी बेटी तुम्हारे जैसे लायक और होनहार बेटा पसंद करेगा, मुझे तुम पर गर्व है। मैं ये शादी के लिए तैयार हूँ बेटा।

तभी मुकेश घर आ करके सविता से कहता है “सविता बेटी तुम जानती हो मैंने हमेशा तुम्हे अपनी बेटी से बढ़कर माना है मैं चाहता हूँ की तुम्हारी जिंदगी की अधूरे सपने को पूरा करू मैं तुम्हारी शादी गौरव से करना चाहता हूँ तुम्हे कोई ऐतराज़ तो नहीं”

सविता – पिता जी परेश की जगह सायद ही मैं किसी को दे पाऊ लेकिन आपने जो मेरे लिए किया है वो कोई कर नहीं सकता आपका फैसला मेरे सरआंखों पर। जैसा आप कहे मुझे मंजूर है और फिर सविता और गौरव की धूम-धाम से शादी हो गयी और सब ख़ुशी-ख़ुशी से रहने लगे।